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नुक़्ते का प्रयोग

हिन्दी भाषा में नुक़्ते का प्रयोग किन शब्दों के साथ होना चाहिए? (विद्वान् अधिवक्ता एवं परम मित्र दीपक जी शर्मा एवं राहुल पारीक के प्रश्न का उत्तर) हिन्दी भाषा में बहु प्रयुक्त अरबी एवं फ़ारसी भाषा के शब्दों  को हिन्दी भाषा की अपनी शब्द - संपदा से पृथक् दिखाने के लिए देवनागरी वर्णमाला के पाँच वर्णों (#क़ ख़ग़ज़फ़) के साथ नुक़्ता लगाने की परंपरा शुरू की गई थीं)इस कहानी को समझने के लिए हमें हिन्दी भाषा के शब्द - भंडार के विषय में जानना होगा। हिन्दी भाषा की शब्द - संपदा में - तत्सम, तद्भव, देशज, विदेशज और संकर पाँच प्रकार के शब्दों का इस्तेमाल होता है। तत्सम शब्दावली(संस्कृत - शब्द) ही हिन्दी भाषा की आत्मा है। इन तत्सम शब्दों में हिन्दी ने अपनी प्रकृति के अनुरूप रूपांतरण करके अपनाया, उन शब्दों को हम तद्भव शब्द कहते हैं। यथा - हस्त से हाथ, दधि से दही, भिक्षा से भीख आदि। कालांतर में देशज शब्दों (कंजर, कुड़ा,खटपट, गाड़ी, टाँग, बकबक, पेड़, पिल्ला, हक्का-बक्का आदि) का प्रचलन भी हमारी हिन्दी में होने लगा। हिन्दी भाषा की शब्द - यात्रा पर यहीं विराम नहीं लगा अपितु जब हमारा सम्पर्क बा

प्रीति और प्रेम

सामान्‍यतः 'प्रीति' और 'प्रेम' ये दोनों शब्द समान ही प्रतीत होते हैं, फिर भी इनके प्रयोग  में सूक्ष्म अंतर है। प्रीति शब्द - प्री +क्तिन् - से बना है। जिसका अर्थ - प्रसन्नता, आह्लाद, संतोष, ख़ुशी या आनंद हैं।सामान्यतः प्रीति अपने से छोटे के प्रति होने वाला स्नेह ही है। परंतु लौकिक दृष्टि से प्रीति किसी - किसी को वस्तुओं से भी हो जाती है। सांख्य दर्शन में महर्षि कपिल ने - प्रीति का संबंध सत्त्वगुण से जोड़ा तो वहीं रजोगुण का अप्रीति के साथ तथा तमोगुण का विषाद के साथ संबंध बताया है। (प्रीत्यप्रीतिविषादात्मका........) किसी उत्तम और सुंदर बात या वस्तु अथवा श्रेष्ठ सत्ता के प्रति स्वाभाविक रूप से होने वाला सात्त्विक झुकाव या प्रवृत्ति ही वास्तविक रूप में प्रेम है। यथा-ईश्वर, प्रकृति देश या साहित्य के प्रति होने वाला प्रेम। लौकिक दृष्टि से प्रेम शब्द का प्रयोग मोहजन्य पदार्थ या शारीरिक व्यापार के संदर्भ में होता है।  श्रृंगारिक क्षेत्र में यह स्त्री-पुरुष के उस प्रेम का प्रतीक है जो साधारण अनुराग और स्नेह से बहुत कुछ आगे बढ़ा हुआ हो। इसीका समार्थक शब्द 'प्रणय'

शब्द-संधान 2

अनुराग शब्द अनु उपसर्ग से राग (मूलतः रञ्ज् +घञ्)शब्द लगने से निष्पन्न हुआ है,जिसके व्युत्पत्ति परक अर्र्थ-लालिमा,निष्ठा, स्नेह आदि हैं। वैयक्तिक रूप से किसी व्यक्ति के आचरण, व्यवहार, योग्यता देखने से हमारे मन में जो रंगत चढ़ती है उसे राग कहते हैं। अनु =पीछे,राग=रंजन.... होना ही अनुराग है। वस्तुतः किसी बात या किसी अनुकूल व्यक्ति के साथ सात्त्विक भाव से मन जुड़ना ही उसके प्रति होने वाला अनुराग है। अनुराग का विलोम विराग है। अनुराग प्रायःसकारात्मकता का सूचक है।यह व्यक्तियों के अतिरिक्त साहित्य, संगीत, चित्रकला आदि साहित्य - विधाओं से भी हो सकता है। (यह आवश्यक नहीं कि जिसके प्रति हमारा अनुराग हो वह हमसे अनुराग करता हो या करे) अनुराग का ही समार्थक,अनुरक्ति है ;अनुराग करने वाले को अनुरागी(पुंल्लिंग) कहा जाता है,स्त्रीलिंग में अनुरागिणी होगा। अनुरंजक प्रसन्न करने वाले या संतुष्ट करने वाले को कहा जाता है। अनुरंजन भाववाचक शब्द है,जिसका अर्थ संतुष्ट करना या प्रसन्न करना होता है। अनुरक्त उसे कहा जाएगा जिसे राग हो चुका हो ।यह भूतकालीन कृदन्